शुक्रवार, 15 जून 2007

टोपी ट्रांसफर !

आसमान छूती उमीदें , भागती हुई ज़िन्दगी मे हमे गुड नही , बेटर भी नही सीधे बेस्ट चाहिऐ इसलिये हमे उन तमाम इंतजाम करने को विवश किया जिससे बेस्ट पाया जाये ।
'स्कोर -मोर ' के जमाने मे हम अपने बच्चों को अपनी सामर्थ्य से ज्यादा बड़ा स्कूल मे दाखिला दिला कर एक बड़ी राशि जेब से निकाल सिर्फ दोस्तो मे रौब जमाते फिरते है " हमारा पुत्र शहर के बडे स्कुल मे पढता है ।

स्कूल का बड़ा होना , रोज आर्ट ऎंड क्राफ्ट के नाम
पर लूटते रहना ,फैशन शो , अनुअल दे अलग अलग डोनेशन , विकास शुल्क , देते रहना
हमे भाता है । कमाल की बात है हम बदले मे सिर्फ अपने बच्चों से ही चाहते है स्कूल से नही , हमारी मोटी रकम स्कूल को मोटा बना जाता है । devlopment चर्जेज हम पे करते है अपने ward के देवेलोप्मेंत के लिए नही ,स्कुल के विकास के लिए स्कुल कि ऊच्ची और चमचमाती बिल्डिंग मंहगे प्लान्त्तेसन हमारी आंखों को सकूं दे जाता है ।

रिपोर्ट कार्ड दर्शाता है , हमारे बच्चों का देवेलोप्मेंत .अब अपनी परेशानी का दौर शुरू हो जाता है
माउथ स्पीक के लायक नही रह जाता। सो स्कुल को न सुना कर बुरे मार्क्स के लिए बुरे रिमार्क्स अपने बच्चों पर ही पास करके हम प्राइवेट तियुशन वाले विकल्प की तलाश शुरू कर देते हैं । मतलब भगवान् पर सर्वस्व न्योछावर कर के दक्षिना के लिए पंडित कि तलाश मे लग जाते हैं ।
कभी -कभी मिश्रित भाव मेरे दिलो-दिमाग को ऐसा झकझोर जाता है कि अकेले मे अपने आप को मानसिक रोगी घोषित कर देना पसंद आता है । रोष, दुःख के तालमेल से बनी नदी मे
सावन -भादो की तरह सवालों की बाढ़ आ जाती है । ये सवाल भी अजीब होते है ।
क्या 'पुअर मार्क्स ' के लिए अपना बच्चा ही दोषी है ,स्कुल नही ?
क्या हम स्कूल से एक्स्प्लानेसन नही माँग सकते ?
कम अंक आने पर बुरा भला हम अपने बच्चों के बदले स्कूल को क्यों नही कहते ?
फीस मे delay होने पर fine भरने वाले हम 'गुड' मार्क्स मे देर होने पर क्यों नही मुँह खोलते
?
कहीँ हम स्कूल को बड़ा शेर तो नही समझते ?

हम सब ये करते हैं जी , मुँह खोलते हैं , बुरा -भला भी सुनाया जाता हैं ,मौखिक एक्स्प्लानेसन माँग कर सफाई मे कुछ भी नही सुनते हैं । मतलब चुप ! चुप !! चुप !!!
कहकर बोलती भी बंद कर देते हैं । बच्चे को अन्यत्र स्थानान्तरण कर देते हैं । निजी स्कूल
की कमी कि भरपाई के लिए जो प्राइवेट प्रशिक्षक् रखा जाता है उसे ही सुनाया जाता है । स्कूल को थोड़े न सुनाया जाता है । वेचारा कम पैसे मे पुरी कीमत वसूलने वाला यन्त्र
होता है । सो असफलता की मजबूत कड़ी मान कर सस्ते मे निपट लिया जाता है ।
हमे हिचक नही होती ये सब सुनाने मे " चले आते हैं ग्रामीण इलाक़े से मूंह लेकर ,कादों कमे
अंक से इंजीनियर बनते -बनते रह गए थे । न गणित आता है ना विज्ञान । अरे पुरे ५०० रुपया देता हूँ हर महिने फिर भी तरीके से नही पढा पाया । पैसे मुफ़्त मे आते हैं क्या ?
इस prashixak ने स्कूल मे जमा किये गए ३५०० रूपये मासिक किस्त पर पानी फेर गया । अरमानों का गला रेता है तुने । तुम टीचर नही फटीचर हो । "
उपर्युक्त नौटंकी हमारी भडास जरुर निकलती है पर समस्या का समाधान नही दिखता । हम इसका टोपी उसके सर करते रहते हैं । बीमार बड़ा भाई होता है ओर टेबलेट छोटे भाई को दिया जाता है । हम सरकार को कर के रूप मे एक छोटा सा रकम देते हैं ओर सुविधा मन मुताविक ना मिलने पर धरना प्रदर्शन , भूख हड़ताल , तोड़ -फोड़ , तख्ता पलट तक कर देते प्राइवेट जेबकतरों को भरपूर सम्मान देते हैं । खुली छूट देते हैं क्यों ? मालूम नही ।

अल्बता हम प्राइवेट अस्पताल का गिरेवान हाथ मे रखते हैं । जबकि इनर पार्ट्स ऑफ़ मानवीय शरीर का पता नही होता हमे , लाइफ पर भरोसा किसी को नही होता फिर भी अगर
ईलाज मे थोडा भी इधर -उधर हुआ एवं रिजल्ट बुरा हुआ तो आसमान सर पर टिका लिया जाता है। डाक्टर बाबू पर कानून का हाथ एवं अस्पताल पर पब्लिक कि अंगुली खडी होने मे देर कहॉ करती है।
हम कहते हैं कि कबतक हम अपने भरे गए फी का हिसाब स्कूल से नही माँगेंगे ? कुछ भी दिक्कत हो तो उपभोक्ता फोरम पहुचने वाले जागरूक नागरिक कब स्कूल को स्कूल का दोष बताने का प्रोग्राम है ? कबतक इस उमकते घोड़े को लगाम से वंचित रखा जाएगा ? इसके देख -रेख मे अपना बच्चा ८ घंटा व्यतीत करता है । तो पालिस कौन करेगा । रूप का सृजन कौन करेगा ? स्कूल टीचर या प्राइवेट टीचर जो अपने बच्चे को मात्र एक ही घंटा पढा जाता है । हमे जो सवाल ८ घंटे वाले से पूछना चाहिऐ वो एक घंटे वाले से क्यों पूछने का मन करता रहता है । कब तक हम सिरफिरे की तरह टोपी ट्रांसफर करते रहेंगे ? अब वक्त आ गया है प्राइवेट टीचर की टोपी स्कूल को पहनाने का ।

अपने बच्चों कि बैटरी चार्ज तो किया ही जाना चाहिऐ । लेकिन स्कूल कि बैटरी भी मंथली बेस पर चार्ज करते रहना परम आवश्यक है एवं पुनीत कर्तव्य है अभिभावक का । मतलब
अपने बच्चों को स्कूल के क्लास मे जाने दे एवं आप अपने क्लास मे स्कूल को शामिल रखें । स्कोर मोर स्वतः हो जाएगा ।

गुरुवार, 14 जून 2007

"यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लान्लिर भवति भारतः....."

कला का सम्मान हम सभी उत्साहित होकर करते आये हैं.कला का व्यापक विस्तार हो इसके लिए प्रकृति ने पचुर maatraa मे जगह दी है,पर आज कल ये फ़ैलाने के बदले सिकुड़ता नज़र आ रह है.ये महसूसा ही नही, नंगी आंखों से देखा जा सकता है, कुठाराघात को
हम सब ने मिलकर सहा है, झेला है,और अब बदलते परिवेश को ही पावन पवित्र , मानने कि परिकल्पना हो रही है.मुल्याहीं को अमूल्य मन जा रह है,हम एक अस्थान पर ही कूद-कूद कर थक गए,जबकि एससी उर्जा मे मीलों का सफ़र तय किया जा सकता था.

सुना है कला के महाताव्पूर्ण उपासक स्वर्गीय उस्ताद बिस्मिल्लाह खान फमौस सहनाई वादक अपने घर मे माँ सरस्वती का फोटो ना बल्कि सजावट के लिए रखा बल्कि रोज पूजा भी किया करते थे रियाज़ से पूर्व.जबकि मुस्लिम परिवार मे मूर्ति पूजा कि मनाही है.शहनाई का ये शहंशाह भी एक अव्वल दर्ज का कलाकार ही था.मगर एसके दिल मे सर्वास्ती का जो सम्मान था वो नग्न था. माँ सरस्वती नग्न नही थी .
ऐसे ही कई मुस्लिम कलाकार सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुचे सबों ने सरस्वती को
साड़ी मे ही सम्मान दिया,भरपूर सम्मान देने कि गरज से कभी माँ का साड़ी नही उत्तरा.बल्कि माँ के नंगे पाव को पूजा के बहाने फूलों से ढाका. मेरा मानना है पाव को धक् कर उनलोगों ने जिस शिखर पर पहुच कर तबला,सारंगी,बजाया उस शिखर कि कल्पना एस तुत्पुज्जिये कलाकार के बस कि नही.

ये ८०-९० का बुध मकबूल फ़िदा हुस्सिं.घोर बनाते-बनाते,माधुरी दिक्षित् पर फ़िदा हुआ समूचा कोउन्त्र्य हिहियता रह उसके घोर कि तरह,जबकि लगाम कि जरूरत ही.ताली से हिम्मत मे बढोतरी महंगाई कि तरह होती है सो हुई. माँ सरस्वती को अपनी सस्ती लोकप्रियता केलियेनंगा कर दिया,समर्थन मे हिंदु मुस्लिम सभी कलाकार,और नए मे आधुनिकता का दंभ भरने वाले सभी वर्ग के हिंदु से कला और स्वतंत्रता कि दुहाई देकर मकबूल के नाज नाच मे धर्म निरपेक्षता का मुसिक दिया.

अब भारतीय सहिसुनता को भाप कर,हिंदु कलाकार भारत माता कि साड़ी उत्तर कर अपनी लोकप्रियता का झंडा बाना लिया.पब्लिक विरोध किया,विरोध के विरोध मे कलाकार को भरपूर समर्थन मिल,ताजुब कि बात है उस हंगामे मे लडकी भी नग्न चित्रों के समर्थन मे खुद वेल्ल द्रेस्सेद थी. जबकि नग्नता का समर्थन नग्न होकर किया जता तो, असरकारक हो जता ,तार्किक होता, उचित होता.

तिरंगा झंडा का एक भी कलोर उल्टा- पलती हो जाये तो बबाल मच जता है,ओफ्फिसर सुस्पेंद हो जाते हैं,क्यों ? क्योंकि इससे हमने बड़मिजी से जोड़ कर देखना शुरू कर दिया है.देश कि भावना से पहले ही लिखित रूप मे जोड़ दिया है.अब कोई नही कह सकता कि मेरे अन्दर एक भावना आयी कि केशरिया को निचे या बीच के करके,हरा को उप्पेर या व्हिते को निचे करके अशोक चक्र को किसी कोने मे बैठा कर अपने कला कि भावना को सर्व विदित किया जाये.है किसी मे हिम्मत ? नही !हम मे से कोई नही कर सकता क्योंकि जहाँ पिटे जाने का खतरा हो हाथ नही डालना पसंद है.

भारत माँ भी कल्पना है,उनको भी फोटो मे साड़ी पहनाने वाला कलाकार ही था,उसके दिल मे भी सार्थक भावनाओ का समुद्र रह होगा.तुम होते कौन हो हमारी भावनाओ से टेस्ट मैच खेलने वाले ?

थूक है तुम्हारी विकृत मानसिकता पर,तुम्हारी कला भावना पर,तुम्हारी सस्ती लोकप्रियता पर,वे शर्मी कि हद हो गई.अपनी माँ का बलात्कार कराने चला है.

तुमरे विरोध मे धरना प्रदर्शन भी बेकार है.तुम जैसे मान मर्दन को आतुर कलाकार से तुम्हारी मानसिकता वाले २ मिनुतेस मे तुहे अपनी भावनाओं का बोध करा सकते है.तुम भारत माँ, सरस्वती माँ को पुरे हिंदु कि माँ मानते हो ना इसलिये तेरा ब्रुश एक आकार देता है.ऐसे मे तेरी माँ-बहन का सिर्फ चेहरा लिया जाये और तेरे ही बनाए पेंटिंग्स मे नग्न माँ के मुगलगार्डन से लगा दिया जाये तब भी तुम इससे कला कि भावनाओ का सम्मान ही कहोगे ? अगर हां तो तुम्हे “पदम श्री”मिलनी चाहिऐ.

भगवन ना करे वो दिन आये लेकिन तुम्हे भी सावधानी रखनी होगी अपनी भावनाओ
कि राजधानी मे.नग्नता अगर कला है तो कलाकार कौन नही हो सकता है ?.कला को अपने
हिसाब से परिभाषा मत दो.आवरण देना कला है आवरण उतारना कला नही हो सकता.
चीर हरण कराने वाले दुशाशन ! कृशन कभी भी पैदा हो जाएगा,एक नही हज़ारों अर्जुन के साथ ! वादा किया था
"यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लान्लिर भवति भारतः................"

बुधवार, 13 जून 2007

अक्षराराम्भ !

अक्षराराम्भ !
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ॐ
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या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्रवस्त्रव्रिता
या वीना वर दंद्मंदित्करा या श्वेत्पद्मसना
या ब्रह्म्च्युत शंकर प्रभिर्ती देवी सदवंदिता
सा माँ पातु सरस्वती भगवती निह्शेश जाड्यापहा
ॐ


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भूमि -पूजक कर्ता है वेब भूमि पूजन
ले पूजा के थाल और पत्र -पुष्प चंदन
अभिनन्दन ! अभिनन्दन !!
अभिनन्दन !!
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मान्यवर,
सुस्वागतम
दिल से हस्तांतरित , दिल का सनेह युक्त अस्पन्दन है ,
रोष है , जोश है टोंट है और मनोरंजन है
ये अंजन है , मंजन है ,भंजन है ,वंदन है ,
कुछ खुला गबन है कुछ गहरा मनन है
कुछ नया नूतन नही , नही कोई परिवर्तन है .
बस आपका ही दिया हुआ , आपको समर्पण है

आपके समर्थन पर अर्पित ये सुमन है
अभिनन्दन है ! अभिनन्दन है !
भूमि-नन्दन को अभिनन्दन है !!

मेरे मन के तार !

कुछ तार मेरे मन के उलझे हुये हैं
कुछ सार एस बात के सुलझे हुये हैं /

रौशनी मिली तो उठाई ना नज़र,
अब तो सारे चिराग बुझे हुये है /
कुछ तार मेरे मन के………….

दुखाया है बड़ी बेरहमी से तेरा दिल,
अहसास एस बात के अब मुझे हुये है /
कुछ तार मेरे मन के……………

किस क़दर दूं उस ज़ख्म पे मरहम,
जो ज़ख्म मेरे घात के तुझे हुये है /
कुछ तार मेरे मन के…………….

मंगलवार, 5 जून 2007

"Translate in to Hindi"

1956-58 batch ke M.A.in English tab ke most respectable post "Principle of Govt. High School par virajmaan tha ek sadharan kisaan ka beta. Sadharan kissan hone ke naate unake Pita jee apane kai mahatvpurn bhavnao ko daba kar ek-ek paisa laga diya tha Babu saheb ki padhai me.matlab sab kuchh loota kar bete ki safalta se garvit tha, harshit tha.Beta bhi apane principalship se huye kamaai se Ghar-pariwar chalaane laga tha.

Pita shree chuki gaon ke kisan the,sahajata aur saralta uname koot-koot kar bhari thi, so wo kisaan ke paramparagat dress me hi raha karte the,aur Principal Saheb Principle ke rup me
hi rahe, wahi bak-bak safed kurta-dhoti,aur polished shoes with socks.Unaka ye rup unake pita jee ko hi nahi pure area ko bhata tha.tab jyada padhai ka chalan bhi nahi tha.Area me unake vidawta ki dhak thi,us par faraatedaar chamchamati english un 6 ft.principle ki abhaa
ko kai guna kar jaati thi.

Dehaati pita ko putra moh ke saath apane khoon,pasine se sinchi gai lahlahati fasal {principal saheb } ko weekly dekhane ki ichchha prabal thi .es kaaran jab kabhi bete ko fursat nahi milti saturday aane ki to khud unake papa ji kuch nasta,dahi,ghee,apane baag ka fal lekar milane chale jaate the.Essi kram me kisi Monday ko Papa jee,bete ke school pahuch gaye.Tatkaalin dress kuchh ganda jaroor tha, ess karan naya Asst. Teacher unake papa jee ko Pahchaan bhi na paya,ya fir shayed kabhi mila nahi tha.so well mentioned
Principal ke Papa se wo jod nahi paya,wait karane ko bol apane class chala gaya.

Principal bete ke Kisaan papa se mulakat hui. Baap to tum-tadaam karke hi baat karta hai.
so kuchh teacher ko atpata laga,limit cross ka mamla laga hoga. so Teacher ke puchhane par ki "Ye Kaun hain ? Principal putra reply him "He is My Servent ".Ouestion hindi me
jabab Angrezi me hone se Pitajee ko shak hua. kuchh der sochane ke baad unhone Translate kara liya usi school ke teacher se.Halaanki,servent ko naukar aur naukar servent
kaha jata hai wo jaante the but He is my ka matlab samajhne bhar ki dher thi, School me
hangama shuru ho gaya Ek baap ko apane Bete se apane baap ke liye high quality ka visheshan laga dene ke baad kitna kast hua hoga, kalpna kiya jaaye to roan khada ho jata hai.

Ek haara hua baap khoob khari-khoti sunaane ke baad,foot-foot kar roya,thak kar wapas apane gaon ke liye bujhe kadam se rasta naapana shuru kiya.do kadam chalkar palta aur
Jore se bola "aaj may putravihin ho gaya,aur tujhe apane ghar kya Gaon me bhi nahi aane
dunga jete jee".Unaki zid bhi puri hui. aaj Baap-bete dono God ke ghar hain.Par baaten rah jaati hai seekh dene ke liye ab hum kuchh paaye na paaye,It fully depend upon your sweet will.
Ye sahi hai ki baap ke nirnay ke saath pura samaj khada tha aaj apmanit hote rahane wale baapon ki sankhya bahut adhik hai so samaj apana role kahan se nibha payega.Kamjore samaj, kamjore baap, muhjore bete ke samane ghutana tek diya hai.
JBJP