कब जननी का जन्म हुआ मालूम नहीं. जन्म दिन शुरू से प्रचलन में रहा नहीं .पर पुण्यतिथि की परम्परा संस्कृति में रची बसी है . कल्ह माँ की पुण्यतिथि थी .कल्ह के दिन ही माँ अपना आँचल मेरे सर से समेट ली थी .हमउम्र की माँ क्या दादी अभी मौजूद है, ये उनका सौभाग्य ! मैं अक्सर उनमे माँ तलाशता रहता हूँ झलक मिलती है कभी कभी . दर्द ,मुस्कान तैरता है, उतराता है फिर डूब जाता है . काश ! इश्वरिये संविधान में माँ के जाने पर प्रतिबन्ध होता . माँ को 'माय' कब और कैसे कहा अभी समझ में आ ही रहा था कि....
माय को 'आप' कहते कहते 'तुम' कहना कब और कैसे शुरू किया याद नहीं. रिसर्च का वक्त था ,पिताजी क्यों शुरू से अंत तक ''आप " रहते हैं ,माँ क्यों 'तुम' का सफ़र सुहाना समझती है .फिर से आप कहने का मन था ."आप -तुम -आप" की धुन पर लय देने की चाह , डाह दी गई . 'आप' से 'तुम' तक स्वर साथ दिया 'आप' तक आते आते टूट गया ,बिखर गया स्वर के साथ सब कुछ .क्योंकि माँ धुरी थी .
माँ तुम माँ हो ! केवल माँ हो !! क्यों मैं बहुत बार कहता था . माँ परेशां हो जाती थी सुनकर .
जो है हमारे पास वो दीर्घकाल तक रहेंगे ,ठोस हैं , अविनाशी हैं का भ्रम , हमें हर पल को संजीदगी से जीने नहीं देता,उपयोग ,उपभोग नहीं करने देता .
"न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो ,हर एक पल की ख़ुशी को गले लगा के जियो ! " योजना को तत्काल आकार दिया जाना चाहिए .
फोटो में है माँ अब , दोनों फोटो में माला पहनी हुई है . एक में मुस्कुराती "माय" है , दुसरे में उदास "माय "!
दोनों फोटो कुछ-कुछ बताने समझाने में व्यस्त रहती है .
सोमवार, 29 अगस्त 2011
बृहस्पतिवार, 2 जून 2011
प्रसाद वितरण !
राजपथ पर दरवार सजा .समारोह था. जो अपने बदौलत लालटेन की रोशनी में प्रथम स्थान मैट्रिक में पाए वो सम्मानित किये गए. जो राज्य में प्रथम, जिला में प्रथम आए या फिर अपने स्कूल में अब्बल रहे हो उनके हौसले और बुलंद किये जाए. समाज भी सम्मान करता है, राजा ने भी किया .अगली पंक्ति में बैठे ,खड़े ,सोये व्यक्ति पाता आया है .अशोक राज में पिछली पंक्ति पर भी नज़र जानी चाहिए . दूसरी पंक्ति या आखिरी पंक्ति में कोई क्यों है . क्या पीछे खड़े की नियति हैं पीछे खड़े होना या आलस्य ,प्रमाद ,डर, ? क्या पीछे वाले को धक्का या मौका देकर आगे नहीं किया जा सकता .प्रोत्साहन तो सब पर असर छोडती है .फिर इस क्रिया से कोई अबोध वंचित कैसे रह जाता है .
सुविधाभोगी असुविधा पर क्या बता पायेगा जिससे राजा सलाह करेंगे . राजा को पिछली पंक्ति की दशा का पता अगली पंक्ति वाले से चलने से रहा .विकास १० का हो १०० का नहीं हो, इस सिधांत का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता है ."प्रसाद" का अगली पंक्ति तक का ही वितरण .
राज्य में कई हाई स्कूल बिना हेडमास्टर के चल रहे है .प्राइवेट कोचिंग संस्थान असल विद्या, नक़ल विद्या , सकल विद्या का गुर सिखा कर परीक्षा फल को स्वस्थ बनाये हुए हैं .
राजा से अनुरोध है ,आप हर स्कूल को योग्य प्राचार्य ,आचार्य दीजिये इनको मालूम होता है अंतिम बेंच का हाल , ये बेंच बदलते रहते है और एक दिन ऐसा आता है अंतिम अबोध 'पहला' हो जाता है .और योग्य लोगों की कमी नहीं है राज्य में . योग्य में 'वोट' दीखता नहीं है राजनितिक चश्मे से ,सामाजिक चश्मे से ताकिये बहुत वोट होता है .बात करने चले हैं ,विकास करने चले हैं .
सुविधाभोगी असुविधा पर क्या बता पायेगा जिससे राजा सलाह करेंगे . राजा को पिछली पंक्ति की दशा का पता अगली पंक्ति वाले से चलने से रहा .विकास १० का हो १०० का नहीं हो, इस सिधांत का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता है ."प्रसाद" का अगली पंक्ति तक का ही वितरण .
राज्य में कई हाई स्कूल बिना हेडमास्टर के चल रहे है .प्राइवेट कोचिंग संस्थान असल विद्या, नक़ल विद्या , सकल विद्या का गुर सिखा कर परीक्षा फल को स्वस्थ बनाये हुए हैं .
राजा से अनुरोध है ,आप हर स्कूल को योग्य प्राचार्य ,आचार्य दीजिये इनको मालूम होता है अंतिम बेंच का हाल , ये बेंच बदलते रहते है और एक दिन ऐसा आता है अंतिम अबोध 'पहला' हो जाता है .और योग्य लोगों की कमी नहीं है राज्य में . योग्य में 'वोट' दीखता नहीं है राजनितिक चश्मे से ,सामाजिक चश्मे से ताकिये बहुत वोट होता है .बात करने चले हैं ,विकास करने चले हैं .
सोमवार, 28 फरवरी 2011
दीया की बाती सी माँ !
अँधेरे -उजाले ,सुख- दुःख,
अहसास जिसका हो सके
उन सब में आती जाती सी माँ !
मल-मूत्र, उलटी, थूक-खखार,
आँचल में सँवार लेती ,
प्रकृति की छाती सी माँ !
सर्वोतम पाठशाला में
सर्वोच्च शिक्षा का
क ख ग पढ़ाती सी माँ !
मनभावन खाना खिलाकर
सुनकर बच्चों की डकार
वासी रोटी खाती सी माँ !
अनवरत काम दर्द और थकान,
दिन भर के काँव काँव के बीच,
कोयल सी गाती माँ !
उभरता है अक्श उनके चेहरे पर
हमारे खरोच का भी
निज जख्म को छुपाती आत्मघाती सी माँ
अंतिम बूंद तक दे प्रकाश
स्नेह ख़त्म होने पर भी
जलना बंद नहीं करती
दीया की बाती सी माँ !
रोते बिलखते देखना नहीं पसंद
इसलिए आँख मूंद जाती है माँ !
बुला लेता भले हो निष्ठुर भगवन
रोके नहीं रूकती ममतामयी
सपनों में सौगात लाती सी माँ !
अहसास जिसका हो सके
उन सब में आती जाती सी माँ !
मल-मूत्र, उलटी, थूक-खखार,
आँचल में सँवार लेती ,
प्रकृति की छाती सी माँ !
सर्वोतम पाठशाला में
सर्वोच्च शिक्षा का
क ख ग पढ़ाती सी माँ !
मनभावन खाना खिलाकर
सुनकर बच्चों की डकार
वासी रोटी खाती सी माँ !
अनवरत काम दर्द और थकान,
दिन भर के काँव काँव के बीच,
कोयल सी गाती माँ !
उभरता है अक्श उनके चेहरे पर
हमारे खरोच का भी
निज जख्म को छुपाती आत्मघाती सी माँ
अंतिम बूंद तक दे प्रकाश
स्नेह ख़त्म होने पर भी
जलना बंद नहीं करती
दीया की बाती सी माँ !
रोते बिलखते देखना नहीं पसंद
इसलिए आँख मूंद जाती है माँ !
बुला लेता भले हो निष्ठुर भगवन
रोके नहीं रूकती ममतामयी
सपनों में सौगात लाती सी माँ !
बृहस्पतिवार, 14 अक्तूबर 2010
"अपनी "खिचड़ी" को "खीर" कहना !
"बिहार चुनाव"
बदलाव की इच्छा जब जब बलवती हुई है, बिहार के चुनाव का आधार जातिगत नहीं रहा .
१९७७ और २००५ का चुनाव और इसके परिणाम इसका प्रमाण है. सभी धर्म, जाति के लोग
नीतिश जी को जिताया नहीं था ,बल्कि लालू जी को हराया था. बिहार करवट बदला, क्योंकि
बदलना चाहता था. इसके लिए जातिगत नीति [अनीति ] को ताक पर रखना जरूरी था .
बिहार विकास को हरी झंडी दिखाए वगैर ,नीतिश जी का एक साल भी टिकना मुश्किल था .
अर्थव्यवस्था जनमानस की सोंच को रिचार्ज करता है . बदहाली के राह में खुशहाली के मोड़
भी आते है उस मोड़ से चलकर चौड़ी सड़क पर आया जा सकता है .
विकास की इच्छा बिहार की थी . केवल नीतिश की इच्छा या प्रयास कहना , करोड़ों की भावना को
आहत करना होगा .क्योंकि उनके धुर विरोधी लालू जी पर भी विकास का भूत इस कदर सवार था
कि विकास को रेल की रफ़्तार देने में कोई कोताही नहीं बरती. आज पूरा बंगाल भले ममता अपने
कब्जे में कर लिया हो पर रेल बेकाबू है ." रेल विकास" से "बिहार विकास" का भरोसा जीतने
में लालू अब भी नाकाम हैं.
या यूँ कहें रेल विकास को चुनाव में भुना नहीं सके .सच ही कहा गया है ."सफलता के शिखर पर पहुंचना
आसान हैं, मुश्किल है वहां पर टिके रहना" . लालू की नौटंकी फिर से चालू हुआ 'पार्टी टिकट इच्छुक' के
साक्षात्कार से . इस साक्षात्कार में भरपूर मात्रा में डांट फटकार ,दुत्कार , दुराचार,अत्याचार
जो उनकी पार्टी का शिष्टाचार है}का नंगा प्रदर्शन था . अपमानित कार्यकर्ता लाइन में लग कर उनके
'लालटेन' में 'तेल' तो नहीं ही डाल पायेगा .
चुनावी वादा चाहे किसी भी दल का हो ,पूरा नहीं होता . जनता अब समझ रही है .
बिहार में ७७ और २००५ के बदलाव में चुनावी वादा आने से पहले लोगों ने मन बना लिया था पटकनी देने की .
जो "छूट" पिछले सरकार को मिलती आई है आवाम से वहीँ "छूट " नितीश जी भी चाह रहे हैं .
अब किसी भी सरकार को छूट देने की भूल जनता करती है तो बदलाव अपना अर्थ खो देगा .
एक दरोगा चाह लेता है तो अपने थाने को २४ घंटे के अन्दर टकुये की तरह सीधा कर देता है ,
वैसे ही जिलाधीश अपने जिले को . फिर एक राज्य का मुखिया राज्य को क्यों नहीं कर सकता ?
क्यों अगला पांच साल माँगा जा रहा है ? अपनी "खिचड़ी" को "खीर" कहना उचित है ?
आप अपराधी को माला पहनाकर ,जनता को ताली बजाने को नहीं कह रहे ?
" राजनीति में सब जायज है." इस कथन में राज्य का शोषण है , दोहन है .राष्ट्रद्रोह है .
बिहार में कांग्रेस पुनर्जन्म हेतु गर्भ में है .वैसे गर्भपात का दंश कई बार झेल चुकी है.शुभ शुभ रहा
तो नीतिश जी की "गोद " में खेलना पसंद करेगी . दिल्ली दरबार से नेता तय करने वाली पार्टी
बिहारी जनमानस को केंद्र सरकार द्वारा दिए गए मदद को समझाने, बुझाने या भुनाने में नाकाम साबित हुई.
मतलब राज्य और केंद्र का लेन-देन ठीक वैसे ही रहा जैसे बिगड़ैल बेटा बड़ा होकर बाप से बोल दे मेरे में
आपका खर्च ही क्या है ? राबड़ी जी भी बोली थी "हमें केंद्र ने कुछ नहीं दिया".
प्रो. रघुबंश ने बोलती बंद कर दिया था हिसाब देकर और उनका हिसाब लेकर .
कांग्रेस की चुनावी रणनीति बेहद फीकी है .
और राम विलास तो भोग विलास में लिप्त हैं नहीं तो मायावती अपने ५० सेंधमार भेज पाती .
नीतिश जी विकास की टोपी लगाये हुए भी परेशान है . छुपम -छुपाई खेलना पड़ रहा है .सांप-सीढ़ी भी .
जो इनका साथ दिया उसको तबाह और बर्बाद कर दिया इन्होने . भाजपा को अपना वाला "तीर"
मार कर" शर शैय्या" मुहैया करा दिया है .बोलने के लिए एक शब्द भी नहीं छोड़ा है जिसको मतदाता
के सामने भाजपा बोल सके .बिना शर्त समर्थन देने वाली भाजपा को सशर्त अपने साथ खड़ा होने की
इजाजत दिया है .मतलब "आना है आओ बुलाएँगे नही." उस मोदी से नहीं इस मोदी से काम चलाओ,
वरुण गाँधी से नहीं विकास की आंधी से काम चलाओ . जैसे इनका बाहुबली अबतक केवल जीवन बाटता रहा हो .
जैसा लालू जी ने आडवानी जी का रथ रोककर मुस्लिम समाज का पुरजोर विकास किया था ,ठीक वैसा ही विकास नितीश जी ने "गुजराती मोदी" ,और "वरुण" की "उड़ान" रद्द करवाकर किया है .पता नहीं नेता लोग ठगी को किसी भी रंग से पोत देते है .
भाजपा अकेले भी लड़ती तो ४०-५० सीट निकाल ले जाती अभी मुश्किल से २० निकाल पायेगी .क्योंकि कमज़ोर साथी की जरूरत है नितीश को . उनकी चुनावी रणनीति पिछले ४ साल से चल रही है . क्षेत्र परिसीमन चुपके से अपने फायेदे को सोंच कर किया है .भाजपा की उम्मीदवारी को प्रभावित किया है. केंद्र के पैसे को अपनी जेब का बताने में कामयाब रहा है . खाली पटना और नालंदा का मेकअप करके बिहार को सपना दिखाया है . पत्रकार पटाये गए है.
"दिल वाले बचाए दिल अपना, हम तीर चलाना क्यों छोड़े ! "अपने आदमी की तैनाती एक साल पहले . साईकिल से कन्या शिक्षा , और शिक्षण से पंचर शिक्षक को जोड़ा है .विद्यार्थी और शिक्षक के घर वाले तीर तो चलाएंगे ही . नितीश जी सधे हुए नेता भी हैं .शरद यादव ,जार्ज जैसे को चार्ज किया .बिहार को अपना समझकर ही न किसी को बिहार मसले में फटकने नहीं दिया .'एकोअहम द्वितीयोनास्ति'
कुछ भी हो अन्दर, 75 प्रतिशत लोग बाहर के लिपा पोती से प्रभावित है .एक मौका और नितीश जी को मिले शायद . चलिए दुआ करते है कि भाजपा को जिस मुकाम पर इन्होने पहुचाया है या इस चुनाव में जहाँ भेजने की तैयारी है .वो बिहारी मानस को नसीब न कराये. आदत में सुधार लाना जरुरी समझें. जो जन मानस १५ साल लालू के लालटेन की लाल रोशनी में गुजारा है ,उसे अगला पांच साल नीतिश की तीरंदाजी दिखने में हर्ज़ नहीं दिख रहा . जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझेगी जनता .
--संजय शर्मा---
बदलाव की इच्छा जब जब बलवती हुई है, बिहार के चुनाव का आधार जातिगत नहीं रहा .
१९७७ और २००५ का चुनाव और इसके परिणाम इसका प्रमाण है. सभी धर्म, जाति के लोग
नीतिश जी को जिताया नहीं था ,बल्कि लालू जी को हराया था. बिहार करवट बदला, क्योंकि
बदलना चाहता था. इसके लिए जातिगत नीति [अनीति ] को ताक पर रखना जरूरी था .
बिहार विकास को हरी झंडी दिखाए वगैर ,नीतिश जी का एक साल भी टिकना मुश्किल था .
अर्थव्यवस्था जनमानस की सोंच को रिचार्ज करता है . बदहाली के राह में खुशहाली के मोड़
भी आते है उस मोड़ से चलकर चौड़ी सड़क पर आया जा सकता है .
विकास की इच्छा बिहार की थी . केवल नीतिश की इच्छा या प्रयास कहना , करोड़ों की भावना को
आहत करना होगा .क्योंकि उनके धुर विरोधी लालू जी पर भी विकास का भूत इस कदर सवार था
कि विकास को रेल की रफ़्तार देने में कोई कोताही नहीं बरती. आज पूरा बंगाल भले ममता अपने
कब्जे में कर लिया हो पर रेल बेकाबू है ." रेल विकास" से "बिहार विकास" का भरोसा जीतने
में लालू अब भी नाकाम हैं.
या यूँ कहें रेल विकास को चुनाव में भुना नहीं सके .सच ही कहा गया है ."सफलता के शिखर पर पहुंचना
आसान हैं, मुश्किल है वहां पर टिके रहना" . लालू की नौटंकी फिर से चालू हुआ 'पार्टी टिकट इच्छुक' के
साक्षात्कार से . इस साक्षात्कार में भरपूर मात्रा में डांट फटकार ,दुत्कार , दुराचार,अत्याचार
जो उनकी पार्टी का शिष्टाचार है}का नंगा प्रदर्शन था . अपमानित कार्यकर्ता लाइन में लग कर उनके
'लालटेन' में 'तेल' तो नहीं ही डाल पायेगा .
चुनावी वादा चाहे किसी भी दल का हो ,पूरा नहीं होता . जनता अब समझ रही है .
बिहार में ७७ और २००५ के बदलाव में चुनावी वादा आने से पहले लोगों ने मन बना लिया था पटकनी देने की .
जो "छूट" पिछले सरकार को मिलती आई है आवाम से वहीँ "छूट " नितीश जी भी चाह रहे हैं .
अब किसी भी सरकार को छूट देने की भूल जनता करती है तो बदलाव अपना अर्थ खो देगा .
एक दरोगा चाह लेता है तो अपने थाने को २४ घंटे के अन्दर टकुये की तरह सीधा कर देता है ,
वैसे ही जिलाधीश अपने जिले को . फिर एक राज्य का मुखिया राज्य को क्यों नहीं कर सकता ?
क्यों अगला पांच साल माँगा जा रहा है ? अपनी "खिचड़ी" को "खीर" कहना उचित है ?
आप अपराधी को माला पहनाकर ,जनता को ताली बजाने को नहीं कह रहे ?
" राजनीति में सब जायज है." इस कथन में राज्य का शोषण है , दोहन है .राष्ट्रद्रोह है .
बिहार में कांग्रेस पुनर्जन्म हेतु गर्भ में है .वैसे गर्भपात का दंश कई बार झेल चुकी है.शुभ शुभ रहा
तो नीतिश जी की "गोद " में खेलना पसंद करेगी . दिल्ली दरबार से नेता तय करने वाली पार्टी
बिहारी जनमानस को केंद्र सरकार द्वारा दिए गए मदद को समझाने, बुझाने या भुनाने में नाकाम साबित हुई.
मतलब राज्य और केंद्र का लेन-देन ठीक वैसे ही रहा जैसे बिगड़ैल बेटा बड़ा होकर बाप से बोल दे मेरे में
आपका खर्च ही क्या है ? राबड़ी जी भी बोली थी "हमें केंद्र ने कुछ नहीं दिया".
प्रो. रघुबंश ने बोलती बंद कर दिया था हिसाब देकर और उनका हिसाब लेकर .
कांग्रेस की चुनावी रणनीति बेहद फीकी है .
और राम विलास तो भोग विलास में लिप्त हैं नहीं तो मायावती अपने ५० सेंधमार भेज पाती .
नीतिश जी विकास की टोपी लगाये हुए भी परेशान है . छुपम -छुपाई खेलना पड़ रहा है .सांप-सीढ़ी भी .
जो इनका साथ दिया उसको तबाह और बर्बाद कर दिया इन्होने . भाजपा को अपना वाला "तीर"
मार कर" शर शैय्या" मुहैया करा दिया है .बोलने के लिए एक शब्द भी नहीं छोड़ा है जिसको मतदाता
के सामने भाजपा बोल सके .बिना शर्त समर्थन देने वाली भाजपा को सशर्त अपने साथ खड़ा होने की
इजाजत दिया है .मतलब "आना है आओ बुलाएँगे नही." उस मोदी से नहीं इस मोदी से काम चलाओ,
वरुण गाँधी से नहीं विकास की आंधी से काम चलाओ . जैसे इनका बाहुबली अबतक केवल जीवन बाटता रहा हो .
जैसा लालू जी ने आडवानी जी का रथ रोककर मुस्लिम समाज का पुरजोर विकास किया था ,ठीक वैसा ही विकास नितीश जी ने "गुजराती मोदी" ,और "वरुण" की "उड़ान" रद्द करवाकर किया है .पता नहीं नेता लोग ठगी को किसी भी रंग से पोत देते है .
भाजपा अकेले भी लड़ती तो ४०-५० सीट निकाल ले जाती अभी मुश्किल से २० निकाल पायेगी .क्योंकि कमज़ोर साथी की जरूरत है नितीश को . उनकी चुनावी रणनीति पिछले ४ साल से चल रही है . क्षेत्र परिसीमन चुपके से अपने फायेदे को सोंच कर किया है .भाजपा की उम्मीदवारी को प्रभावित किया है. केंद्र के पैसे को अपनी जेब का बताने में कामयाब रहा है . खाली पटना और नालंदा का मेकअप करके बिहार को सपना दिखाया है . पत्रकार पटाये गए है.
"दिल वाले बचाए दिल अपना, हम तीर चलाना क्यों छोड़े ! "अपने आदमी की तैनाती एक साल पहले . साईकिल से कन्या शिक्षा , और शिक्षण से पंचर शिक्षक को जोड़ा है .विद्यार्थी और शिक्षक के घर वाले तीर तो चलाएंगे ही . नितीश जी सधे हुए नेता भी हैं .शरद यादव ,जार्ज जैसे को चार्ज किया .बिहार को अपना समझकर ही न किसी को बिहार मसले में फटकने नहीं दिया .'एकोअहम द्वितीयोनास्ति'
कुछ भी हो अन्दर, 75 प्रतिशत लोग बाहर के लिपा पोती से प्रभावित है .एक मौका और नितीश जी को मिले शायद . चलिए दुआ करते है कि भाजपा को जिस मुकाम पर इन्होने पहुचाया है या इस चुनाव में जहाँ भेजने की तैयारी है .वो बिहारी मानस को नसीब न कराये. आदत में सुधार लाना जरुरी समझें. जो जन मानस १५ साल लालू के लालटेन की लाल रोशनी में गुजारा है ,उसे अगला पांच साल नीतिश की तीरंदाजी दिखने में हर्ज़ नहीं दिख रहा . जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझेगी जनता .
--संजय शर्मा---
शुक्रवार, 18 जून 2010
"भूतपूर्व का भूत"
रोते बिलखते और अब ललकारते भोपाल को
पुरे २५ साल बाद एडरसन की याद आई .
मिडिया को एडरसन को भगाने या भागने की
खबर क्यों न लगी एडरसन को तत्कालीन
प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री और कानून मंत्री ने भगाया
तो उसके बाद आये कई अलग अलग तरह
की सरकार, अलग-अलग तरह के प्रधानमंत्री
और उनका मंत्रालय क्यों आँखें बंद किये रहा ?
क्यों तथाकथित जागरूक और बुद्धिजीवी
विपक्ष सोता रहा ? देश प्रदेश की सरकार,
विपक्ष, और मिडिया अनभिज्ञ नहीं रहा होगा
एडरसन के भागने में भागीदारी इन सबकी है.
आज चुनाव नजदीक है तो भोपू तो बजेगा ही.
देश की जनता किसी पार्टी पर भरोसा न करते
हुए भी वोट डाल आता है , नागनाथ या सांपनाथ
को जीतना तय होता है . जो सता में आता है वो
भूतपूर्व दोषी को उसके भूतपूर्व दोषपूर्ण कार्यों को
सीबीआई का आइना दिखाने की धमकी भर देता है .
बदले में वर्तमान में दूषित कार्य के लिए समर्थन
मिलता है . सभी जानते है पूर्ण प्रणाली दोषपूर्ण
है .फिर भी हाय-तोबा में शामिल होते हैं.
एडरसन को जब आयात किया गया तब क्या
अनुमान नहीं था कि कोई हादसा हो सकता है ,
जबकि बचपन से पचपन तक का मानव ये
जानता है कि विज्ञान वरदान और अभिशाप दोनों है.
एडरसन ने गैस पाइप काटा था ? नहीं न .फिर ?
बिजली ने कम नहीं मारा है निर्दोर्षों को उसे भी
रोज गिना जाना चाहिए , उर्जा मंत्री को लपेटे
में लेना चाहिए .
एडरसन को लाया गया तो क्या कानूनी प्रक्रिया
इतनी लम्बी नहीं चलेगी कि वह जेल में दम
तोड़ दे बाद उसके फांसी की सजा होगी .पार्थिव
शरीर को फांसी दी जाएगी ?
सिर्फ और सिर्फ मुआवजा चाहिए उनके अभिशप्त
अवशेष को .नेताओ की राजनीति की रोटी पीड़ितों के
तवे पर नहीं सेंकी जानी चाहिए.
एडरसन का सर उन्हें नहीं चाहिए अब .आप तख्ती
चाहे जो लटका दे .एडरसन का जेब ढीली कराये तो
जानू .
ये भूतपूर्व का भूत किसी को अभूतपूर्व बनाने से रहा.
पुरे २५ साल बाद एडरसन की याद आई .
मिडिया को एडरसन को भगाने या भागने की
खबर क्यों न लगी एडरसन को तत्कालीन
प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री और कानून मंत्री ने भगाया
तो उसके बाद आये कई अलग अलग तरह
की सरकार, अलग-अलग तरह के प्रधानमंत्री
और उनका मंत्रालय क्यों आँखें बंद किये रहा ?
क्यों तथाकथित जागरूक और बुद्धिजीवी
विपक्ष सोता रहा ? देश प्रदेश की सरकार,
विपक्ष, और मिडिया अनभिज्ञ नहीं रहा होगा
एडरसन के भागने में भागीदारी इन सबकी है.
आज चुनाव नजदीक है तो भोपू तो बजेगा ही.
देश की जनता किसी पार्टी पर भरोसा न करते
हुए भी वोट डाल आता है , नागनाथ या सांपनाथ
को जीतना तय होता है . जो सता में आता है वो
भूतपूर्व दोषी को उसके भूतपूर्व दोषपूर्ण कार्यों को
सीबीआई का आइना दिखाने की धमकी भर देता है .
बदले में वर्तमान में दूषित कार्य के लिए समर्थन
मिलता है . सभी जानते है पूर्ण प्रणाली दोषपूर्ण
है .फिर भी हाय-तोबा में शामिल होते हैं.
एडरसन को जब आयात किया गया तब क्या
अनुमान नहीं था कि कोई हादसा हो सकता है ,
जबकि बचपन से पचपन तक का मानव ये
जानता है कि विज्ञान वरदान और अभिशाप दोनों है.
एडरसन ने गैस पाइप काटा था ? नहीं न .फिर ?
बिजली ने कम नहीं मारा है निर्दोर्षों को उसे भी
रोज गिना जाना चाहिए , उर्जा मंत्री को लपेटे
में लेना चाहिए .
एडरसन को लाया गया तो क्या कानूनी प्रक्रिया
इतनी लम्बी नहीं चलेगी कि वह जेल में दम
तोड़ दे बाद उसके फांसी की सजा होगी .पार्थिव
शरीर को फांसी दी जाएगी ?
सिर्फ और सिर्फ मुआवजा चाहिए उनके अभिशप्त
अवशेष को .नेताओ की राजनीति की रोटी पीड़ितों के
तवे पर नहीं सेंकी जानी चाहिए.
एडरसन का सर उन्हें नहीं चाहिए अब .आप तख्ती
चाहे जो लटका दे .एडरसन का जेब ढीली कराये तो
जानू .
ये भूतपूर्व का भूत किसी को अभूतपूर्व बनाने से रहा.
शुक्रवार, 21 मई 2010
अनिवार्य योग्यता
नक्सल के हाथो मारे गए भारतीय नागरिक सामान्य नहीं असामान्य थे .
क्योंकि वे "खबरी लाल" थे , और दुसरे पुलिस के जवान के "हमसफ़र" थे
बस के अन्दर .बस ये अनिवार्य योग्यता काफी था ,उनके चयन का .
खूनी राजनीति की थाली में "लालू की लाली " दिखना भी अनिवार्य था ।
बुधवार, 19 मई 2010
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