सोमवार, 7 जुलाई 2008

मेरी दाल गला दो ना !

मुस्कान दे आए सुबह को,

शाम की सुध लेगा कौन ?

उदास हो रही है साझ

एक दीया जला दो ना !

अछूत बुझती नींद आंखों को

या दोनों पलकों में झड़प हुआ

इन थकी,खुली आंखों में,

एक सुंदर ख्वाब पला दो ना !

घुल-मिलकर अस्तित्व मिटा लेता

पर जग सारा, खारा पानी है

बस तुम अपनी मन-गंगा में,

मेरी दाल गला दो ना !

2 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

बस तुम अपनी मन-गंगा में,
मेरी दाल गला दो ना !
"wah, an interesting and different kind of poetry, nice one"

advocate rashmi saurana ने कहा…

bhut badhiya rachana. badhai ho.